रूह

Souel

ना जाने  क्यूँ इंतज़ार सा रहता है इस रूह को पलट आने का। जाने कैसे मौत के आग़ोश से बच के निकल जाती है बार बार। इक नया आशियाना ढूँढ लेती है किसी और को तड़पाने के लिए।फिर किसी और का दिल करने को जार जार। रात का काला पहर हो या धूप से तपती दोपहर। मंज़िल दौलत मंद महलों की हो या छोटे बड़े गाँव शहर। चली जाती है  हर किसी को  बीच राह में छोड़ के। कभी तो मर के देखे ये ख़ुद भी। महसूस करे अपनो से बिछुड़े लोगों के दिल का हाल।

14 thoughts on “रूह

  1. ना रूह पलटती है ना इतंजार खत्म होता है पर जिस पल मौत का आगाज़ होता है वो एक मंज़र होता जब सब बैचैन होते हैं पर ख़ुद को ख़ुद पर एतबार होता है ।

    “मृत व्यक्ति के मुख पर शांति”

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    1. Thanks dear for reading my post I was just wondering how this soul remains immortal by changing the body frequently and penned this composition.

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  2. बेहड़ खूब दिल से लिखा है परवीन जी!
    दर्द और उम्मीद का खूब मिश्रण किया है आप्ने.भै वाह!!

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      1. I just tried today and wrote both these posts. Believe me my banker friends are appreciating like anything. Either they were not following my english books earlier but they have been writing continuously Thanks a lot and I will continue writing in hindi too

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